सोमवार, 22 मार्च 2010

सत्य

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सात दशक लांघ चुका
हड्डियों का खोखला ढांचा
सिकुड़ती चर्म व्यथा
झुर्रियों का मर्म
और
महानगरीय फुटपाथ पर
सिसकती, सुबकती
और चीखती भूख
कब दम तोड़ेगी?
अर्द्धनग्न सत्य
अनदेखा हो
कैसे सम्भव है ?
देखती हुई नज़रें
झुग्गियों से उठता
भूख का जयघोष
असहनीय गंदगी से रूबरू
घण्टों खड़े रहकर
दम साधे
प्लास्टिक और कचरा जुटाती
भविष्य की
साकार प्रतिमूर्तियां
आखिर कैसे और कब
समाजवाद ला पाएगी ?
इनके घृणास्पद
अर्द्धनग्न सत्य पर
कटे फटे
पेबंदी कुर्तों की
प्रदर्शनी इसीलिए टांगी जाती है
ताकि उनका वैभव
बिना किसी बाधा के अभिवृद्धि पाता रहे
नालियों की गंदगी
और कचरे का ढेर
इनका देवता है
और चुनी हुई
बहुमूल्य गंदगी
इनकी पूजा।


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