बुधवार, 10 मार्च 2010

घंटियाँ

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बजाते रहे
सदियों से
मंदिरों की घण्टियां
पर भगवान नहीं आए
कितनी अटल है हमारी आस्था
हर दिन
सुबह और शाम
बजाते हैं घण्टियां / जोर जोर से
पर भगवान सुनता ही नहीं
और ना ही आता है हमारे पास
आश्चर्य है मुझे इस स्थिति पर
और इससे बढ़कर
आश्चर्य है
हमारी सहनशीलता पर
जो निरन्तर बजा रहे हैं घण्टियां
ऑफिस में दो-दो बार
घण्टी बजाने के बाद भी
जब चपरासी उसे
नहीं सुनता है
तो
छूट जाता है हमारा धैर्य
गनीमत है
चौथी घण्टी में वह आ तो जाता है
घण्टी भगवान के लिये हो या चपरासी के लिए
घण्टी तो घण्टी है
घण्टियों के कई प्रकार हैं
हर प्रकार नया और मौलिक
कभी दिल की घण्टी बजती है
तो कभी चुनावी नारों और घोषणाओं की
विषयों को बदलने का कार्य
करती है विद्यालय की घण्टी
तो कभी चीखकर बुलाती है फोन की घण्टी
हमारा परिवेश घण्टियों का परिवेश है
पर दुर्भाग्य
भगवान से लेकर आम आदमी तक
इसे सुनने वाला
यहां कोई नहीं
है तो केवल बजती हुई घण्टियां
और मैं..... ।

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