बुधवार, 31 मार्च 2010

अवशेष

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दरकती दीवारों में
अनगिनत दरारें
बिन कहे कह रही हैं बहुत कुछ
सदियों की धूप, पानी
और हवाओं के थपेड़े सहकर
इन खण्डहरों की निखर आई है रंगत
कक्षों के शेष बचे अवशेष
और उनकी दीवारों पर
अब भी गहरे तक जमी काई
गवाही दे रही हैं
बरसों पुरानी सभ्यता की।
इतिहास हो गई इमारतें
सैलानियों के लिये कौतूहल है।
क्षतिग्रस्त अवशेष कभी रहे होंगे हरे
और इनमें रचने-बसने वाली सरसता
आज महज महसूस की जा सकती है।
ऊंचाई पर इतिहास को संजोए
भव्य भवनों का झुंड
झांक कर देखता है नीचे बसी
सघन बस्तियों को
और कहता है मूक शब्दों में
कि इन सब का भविष्य भी
हमारे वर्तमान का ही प्रतिरूप होगा।


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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

    Sanjay kumar
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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